“कस्तूरबा गाँधी विद्यालय की लड़कियों से नहीं मिलती तो ज़िंदगी में बहुत कुछ सीखना रह जाता”

पहली बार कस्तूरबा विद्यालय में रुकने का मौका मिला

खैरा गाँव के कस्तूरबा विद्यालय में अध्यापकों से थोड़ी बहुत बातचीत होने लगी थी। कुछ दिन पहले उन्होंने कहा आप हमारे साथ रुक सकती हैं। फिर पिछले महीने 2 अक्टूबर 2019 को वहां पहली बार रुकने का मौका मिला। i-Saksham के स्कूल कार्यक्रम का एक हिस्सा होने के नाते मैंने सोचा था कि कुछ बातों का खास ध्यान रखूंगी। जैसे,

  • बच्चियों को बेहतर जानना
  • उनका आपसी सम्बन्ध समझना और
  • शिक्षक व बच्चियों के एक दूसरे के प्रति स्वभाव पर ध्यान देना।

विनीता से मेरी पहली मुलाकात

मैंने अध्यापकों के साथ कुछ वक़्त बिताया। दोपहर का 12 बज रहा होगा, हम सभी बैठे गपशप कर रहे थे और एक दूसरे को बता रहे थे कि दुर्गा पूजा के लिए बाज़ार से तथा ऑनलाइन क्या खरीददारी की गई। अचानक मैंने एक हलचल महसूस की।

लड़कियों के लिए आज भी जीवन आसान नहीं

कुछ और अविभावकों से बात करके पता चला कि उनके गाँव में विद्यालय ना होने के कारण उन्होंने अपनी बच्चियों को यहां छोड़ा है। वे सभी दूर-दूर से आए थे।

सोने से पहले ललिता से बातें

रात होने लगी थी, हम सभी ने खाना खाया और सभी सोने की तैयारी में लग गए। यहां सभी लड़कियां अपने सारे काम खुद करती हैं। सुबह 5 बजे से इनका दिन शुरू होता है और रात 10 बजे तक सभी सो जाते हैं।

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Aditi

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